दर्शनीय स्थलभारत की छोटी काशी तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का पेरिस कहलाने वाला गुलाबी नगर पर्यटन की दृष्टि से विश्व के मानचित्र में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। इस मन भावन शहर में ऐसा बहुत कुछ है जिसे पर्यटक देखना, समझना व स्मृति के रूप में संजोना चाहते हैं और उसे अपने स्मृति कलश में भर कर साथ ले जाना चाहते हैं। |
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सिटी पैलेससवाई जयसिंह ने शहर की स्थापना करते हुये चार दीवारी का लगभग सातवां हिस्सा अपने निजी निवास के लिये बनवाया। राजपूत और मुगल स्थापत्य में बना महाराजा का यह राजकीय आवास चन्द्र महल के नाम से विख्यात हुआ। चन्द्र महल में प्रवेश करते ही मुबारक महल के नाम से एक चतुष्कोणीय महल बना हुआ है। इस महल में स्थित पोथीखाने में बहुमूल्य दुर्लभ हस्तलिखित ग्रन्थो की पाण्डुलिपियां सरंक्षित है। महल की उपरी मंजिल पर बने वस्त्रागार में म्यूजियम में राजकीय पोशाकें, अलंकरण, आभूषण आदि संग्रहित किये गये हैा इसके समीप ही म्यूजियम का शस्त्रागार है जिसमें महाराजाओं द्वारा काम में लिये गये हथियार और शस्त्र प्रदर्शित किये गये है जिसमें शस्त्रागार में जयपुर के महाराजाओं को विभिन्न अवसरों पर पुरस्कार स्वरूप मिले शस्त्रों को भी प्र्दर्शित किये गये हैं। मुबारक महल में श्वेत संगमरमर से निर्मित राजेन्द्र पोल से दीवाने आम में प्रवेश किया जाता है। इस समय दीवाने आम में महारजा सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा अपनी इंग्लेण्ड यात्रा के दौरान गंगाजल ले जाने के लिये दो विशाल रजत कलश रखे हुए हैं। चन्द्र महल के म्यूजियम को दिये हिस्से में महाराजाओं के आदमकद विशाल चित्र मानचित्र, गलीचे एवं बहुमूल्य राजकीय सामग्री के साथ ही अनेक दुर्लभ पाण्डुलिपियां भी प्रदर्शित की गयी हैा परिसर में बने दीवाने खास में तत्कालीन नरेशों और महत्वपूर्ण दरवाबारियों की विशेष बैठकें आयोजित की जाती थी। चन्द्र महल महाराजाओं के सुख सुविधा की दृष्टि से स्थापत्य और वास्तुशिल्प का अनूठा नमूना है। मध्य युग में निर्मित यह भवन भूकम्प झटकों से सुरक्षित रखने के लिए तडित चालक की व्यवस्था से भी जुडा हुआ है। |
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जन्तर मन्तरमहाराजा सवाई जयसिंह ने सऩ 1718 में इस वैधशाला की आधार शिला रखी। इस ज्योतिष यंत्रालय में समय की जानकारी, सूर्योदय, सूर्योस्त एवं नक्षत्रों की जानकारी प्राप्त करने के उपकरण अवस्थित हैं। वैधशाला में स्थापित यंत्रों में वृहत सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र, कपाली यंत्र, नाडी वलय यंत्र, घोटा यंत्र आदि मुख्य है। इसको अब यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज की लिस्ट में शामिल किया गया है । |
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हवामहलगुलाबी नगरी के प्रतीक के रूप में विख्यात हुए हवामहल का निर्माण सऩ 1799 में सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। वास्तुविद लालचन्द उसता ने केवल आठ इंच की दीवार के सहारे इस पांच मंजिले 152 खिडकियो से युक्त भवन का निर्माण किया। देशी निर्माण पद्धति से निर्मित हवामहल में प्रकाश व वायु संचार की अत्यन्त आकर्षक एवं समुचित व्यवस्था है। इस महल के पिछले हिस्से में राज्य सरकार द्वारा हवामहल म्यजियम का संचालन किया जा रहा है। म्यूजियम में अनेक कलात्मक वस्तुएं प्रदर्शित की गई है। |
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अल्बर्ट हॉलशहर के सर्वाधिक सुन्दर उद्यान रामनिवास बाग में यह भवन निर्मित किया गया है रामनिवास बाग का निर्माण महाराजा सवाई रामसिंह ने अकाल राहत कार्यो के अन्तर्गत 4 लाख रू; की राशि व्यय कर करवाया था। महाराजा सवाई रामसिंह ने ही सन 1876 में ब्रिटेन के महाराजा एडवर्ड सप्तम प्रिन्स आफ वैल्स के रूप में भारत आने के समय यादगार के रूप में अल्बर्ट हाल का निर्माण प्रारम्भ किया। भवन की डिजाइनिंग सर स्विंटन जैकब द्वारा की गयी। भारतीय व फारसी शैली में बनी इस भव्य इमारत में इस समय म्यूजियम संचालित किया जा रहा है। म्यूजियम में प्रदर्शित को देखकर पर्यटक प्रदेश की संस्कृति की एक झांकी पा सकते हैं। |
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जल महलजयपुर आमेर मार्ग पर मानसागर झील के मध्य स्थित इस महल का निर्माण सवाई जयसिंह ने अश्वमेघ यज्ञ के बाद अपनी रानियों और पंडित साथ अवभ्रत स्नान के लिए करवाया था। इससे पूर्व जयसिंह ने जयपुर की जलापूर्ति हेतु गर्भावती नदी पर बांध बनवाकर मानसागर झील का निर्माण करवाया। जलमहल मध्यकालीन महलों की तरह मेहराबों, बुर्जो, छतरियों एवं सीढीदार जीनों से युक्त दुमंजिला और वर्गाकार रूप में निर्मित भवन है। इसकी उपरी मंजिल की चारों कोनों पर बुर्जो की छतरीयां व बीच की बरादरिया, संगमरमर के स्तम्भों पर आधारित हैं। जलमहल अब पक्षी अभ्यारण के रूप में भी विकसित हो रहा है जलमहल में आने वाले सीवरेज के पानी की दुर्गध की समस्या का समाधान करने के लिए राज्य सरकार द्वारा एक बडी परियोजना बनायी गयी है। |
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ईसरलाटमहाराजा सवाई ईश्वरी सिंह ने इस सुन्दर और अद़भुत वास्तुकला के नमूने का निर्माण करवाया। सात खण्डों की यह मीनार सवाई ईश्वरी सिंह ने अपनी विजय के स्मारक के रूप में बनवायी। यह विजय उन्होनें सात सम्मिलित सेनाओं को बगरू के युद्ध में परास्त कर अर्जित की थी। इसे सरगासूली के नाम से भी जाना जाता है। |
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मंदिरजयपुर की सुबह शंख, घडियाल और कीर्तनों की ध्वनियों से काशी की सुबह जैसी लगती है। मंदिरों के बाहुल्य के कारण इसे दूसरा वृन्दावन भी कहा जाता है। जयपुर के संस्थापक नरेशों के आराध्य देव भगवान गोविन्द देव जी का मंदिर यहां का सबसे प्रमुख माना जाता है। चन्द्र महल के पीछे सूर्यमहल के हिस्से में इस मंदिर का निर्माण करवाया गया। प्रतिदिन लाखों श्रद्धालू प्रात: चार बजे से रात्रि 9 बजे के मध्य भगवान गोविन्द देव जी की लीला चरित्रों की आठ झांकियों के दर्शन करते हैं। मंदिर प्रांगण के पिछवाडे में बादल महल तक जयनिवास उद्यान है। बादल महल तालकटारे के किनारे स्थित है। एल्बर्ट हाल से पीछे जवाहर लाल नेहरू मार्ग पर इन्दिरा सर्किल के निकट स्थित भगवान लक्ष्मीनारायण का मंदिर (बिडला मंदिर ) भी श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के आकर्षक का केन्द्र है। इसके अतिरिक्त मोतीडूंगरी गणेश जी का मंदिर, गढ गणश, लाल डूंगरी, गणेश जी का मंदिर, ताडकेश्वर जी, गोपीनाथ जी, हनुमान जी, राम मंदिर आदि भी श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केन्द्र है। शहर में विशाल मस्जिदें, चर्च और गुरूद्धारे भी है। जहां हर सुबह और शाम श्रद्धा से सिर झुकते हैं। |
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आमेर का किलाशहर से 11 किमी दूर अरावली पर्वतमाल पर स्थित आमेर का किला राजपूत वास्तुकला का अद़भुत उदाहरण है। प्राचीन काल में अम्बावती और अम्बिबकापुर के नाम से आमेर कछवाह राजाओं की राजधानी रहा है। आमेर किले के राजमहलों का निर्माण मिर्जा राजा मानसिंह ने करवाया था। सवाई जयसिंह ने इसमें कुछ नये भवनों का निर्माण करवाया। हिन्दू और फारसी शैली के मिश्रित स्वरूप का यह किला देश में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। महल के मुख्य द्वार के बाहर कछवाहा राजाओं की कुल देवी शिला माता का मंदिर है। महल मे धुसते ही 20 खम्भों का राजपूत भवन शैली पर सफेद संगमरमर व लाल पत्थर का बना दीवाने आम है। दीवाने खास और शीश महल पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केन्द्र है। महल में मावठा झील से आती ठण्डी हवाओं का आनन्द लेने के लिये सुख निवास भी स्थित है। रानियों के लिये अनेक निजी कक्ष भी निर्मित है। |
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बी.एम. बिडला सभागारस्टेच्यू सर्किल एवं शासन सचिवालय के पास 9.8 एकड भूमि पर बिडला विज्ञान एवं तकनीकी केन्द्र स्थित है। इस केन्द्र में विज्ञान संग्रहालय, कम्प्यूटर केन्द्र, अनुसंधान केन्द्र एवं पुस्तकालय है। बिडला तारामण्डल देशी विदेशी पर्यटकों के आकर्षक का मुख्य केन्द्र है। परिसर में स्थित 1350 दर्शकों के बैठने की क्षमता से युक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का सभागार यहां की मुख्य पहचान बन चुका है। इस केन्द्र के मुख्य प्रवेश द्वार पर आमेर किले की गणेश पाल की प्रतिकृति निर्मित की गयी है। |
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गलताऋषि गालव की पवित्रा तपोभूमि गलता एक प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है। शहर की पूर्वी पहाडियों पर अवस्थित गलता के कुण्ड में गोमुख से निरन्तर पानी बहता रहता है। पर्वत की सर्वोच्च उंचाई पर सूर्य मंदिर है। गलता के रास्ते में पर्वत श्रृंखलाओं के बीच घाट की गूणी और आमागढ स्थित है। घाट की गूणी क्षेत्रों में ही सवाई जयसिंह तृतीय की महारानी सिसोदिया द्वारा सऩ 1779 में निर्मित सिसोदिया रानी का महल एवं बाग है। इस बाग में आकर्षक फव्वारे एवं भव्य महल बना हुआ है। इसके समीप ही जयपुर के मुख्य वास्तुविद एवं नगर नियोजक विद्याधर के नाम से अनेक फव्वारों एवं कुण्डों से आच्छादित विद्याधर का बाग भी पर्यटकों के आकर्षक का केन्द्र है। |
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जिले के अन्य पर्यटन स्थलशहर से करीब 26 किमी दूर स्थित जमवारामगढ बांध भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। सऩ 1982 में एशियाड के दौरान नौकायन प्रतियोगिताएं आयोजित की गयी थी। लगभग 16 वर्गकिलोमीटर क्षेत्रफल की इस झील को पिकनिक की दृष्टि से उपयुक्त स्थल माना जाता है। बांध स्थल के समीप ही जमुवा माता का मंदिर है। शहर के दक्षिण में 13 किमी दूर स्थित तहसील मुख्यालय सांगानेर, रंगाई छपाई और कागज निर्माण के लिए विख्यात है। देश की सबसे बडी खारे पानी की झील सांभर नमक के सबसे बडे स्त्रोत होने के साथ ही पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यन्त आकर्षक स्थल है। उत्तरी भारत के चौहान राजाओं की प्रथम राजधानी सांभर पौराणिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां पर शाकंम्भरी माता का मंदिर है। |
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बैराठजयपुर शाहपुरा अलवर मार्ग पर स्थित बैराठ प्राचीन धरोहर को संजोये हुए अत्यन्त मनोरम स्थल है। यहां पर जनश्रुतियों के अनुसार पांडवों ने अपना निर्वासित जीवन व्यतीत किया था। बैराठ के समीप पहाडियों पर भव्य बौद्ध मठ के भी अवशेष मिले हैं। यह अवशेष बौद्ध अनुयायियों के लिये पर्यटन की असीम संभावनाएं समेटे हुए है। |
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मेले एवं पर्वतीज - श्रावणी तीज के अवसर पर जयपुर में लगने वाला यह मेला अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। इस दिन छ़योढी से पूजा अर्चना के बाद पूरे लवाजमें के साथ तीज माता की सवारी निकाली जाती है। यह सवारी त्रिपोलिया बाजार, छोटी चौपड, गणगौरी बाजार और चौगान होते हुए पालिका बाग पहुंचकर विसर्जित होती है। सवारी को देखने के लिये रंग बिरंगी पोशाकों से सजे ग्रामीणों के साथ ही भारी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। |
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गणगोरकिशोरियों एवं नवविवाहिताओं द्वारा अपने प्यार या पति की खुशहाली के लिये पार्वती पूजा का यह पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर के रूप में मनाया जाता है। तीज की तरह इस दिन भी गणगौर माता की सवारी निकाली जाती है। इस अवसर पर पारंपरिक मिठाई घेवर का भी आनन्द लिया जाता है। |
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हाथी महोत्सवहोली के दिन शहर के चौगान स्टेडियम में मनाये जाने वाला यह महोत्सव विदेशी पर्यटकों के लिये सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र होता है। महोत्सव में सजे धजे हाथी भाग लेते है। इसमें हाथी पोलो, हाथी दौड के साथ ही हाथी पर बैठकर होली खेलने का भी आनन्द लिया जाता है। |
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सांस्कृतिक गतिविधियांअपनी स्थापना से ही जयपुर अन्तराष्ट्रीय स्तर का सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये प्रमुख केन्द्र जवाहर कला केन्द्र एवं रवीन्द्र मंच है। इन केन्द्रों पर कला और कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिये वर्ष पर्यन्त अनेक आयोजन होते रहते हैं। जयपुर की चित्र कला ढूंढाडी शैली के नाम से अपना एक विशेष स्थान रखती है। यहां के भवनों, मंदिरों आदि पर पाये जाने वाले भित्ती चित्रों की भी अपनी एक अलग पहचान है। इन चित्रो में पीपल, बड, घोडा, मोर आदि का अधिक चित्रण किया जाता है एवं हरे रंग का अधिक उपयोग होता है। अधिकांश चित्र रंगमाला, बरहमासा कृष्ण चरित्र आदि के हैं। |
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